हल्ला बोल कस कर बोल

हल्ला बोल कस कर बोल

      हल्लाबोल

शिक्षा का गन्दा व्यापार आज जो चल रहा है और सरकार की कोई लगाम नही उस पर।
तकनीकी संस्थानों में रोज़गार देने के नाम पर फ़र्ज़ी कम्पनीज को रोज़गार मेला में बैठा कर विद्यार्थियों की भावनाओं से खेलना उनके सपनों को रौंद कर उस पर अपनी झूठी शख्सीयत की कहानी जड़ना आखिर कहाँ तक जायज़।।।

यह दिखा रहा है कि फर्श पर गेंहू बोने पर बटोर जा सकता है लेकिन खेत में डालने पर वह अंकुरित होकर फल देने लगता है, आप उसे बटोर नही सकते । 
दिन दूनी रात चौगुनी गति से वह प्रतिफल देगा।
यह एक ऐसी भूल है जिसका फल आने वाले काफी समय तक भुगतना पड़ेगा । निजी फायदे के चक्कर में भावनाएं भड़का देना आसान है लेकिन उस गुबार को रोकना मुश्किल है । 
इन्हें शायद खुदपर कुछ ज्यादा ही भरोसा था । 
खैर.. मार्केटिंग बेस्ड राजनीति को नमन और अति आत्मविश्वासी नेताओं को नमन ..

मेरा देश बहुत तेजी से बदल रहा है, पता नही किधर - किधर बढ़ रहा है।।

 

दलाल नही . इंजीनियर बनाओ  चाटुकारों और पिछलघुओं

दलाल नही . इंजीनियर बनाओ चाटुकारों और पिछलघुओं

दलाल नही . इंजीनियर बनाओ

चाटुकारों और पिछलघुओं को समर्पित। ।।
बुरा लगे तो नेत्रदान तुरन्त करदें।।

 

छात्रों ज़रा गौर करना कि जो मास्टर एडमीशन के लिए तुमसे कहता हो कि बेटा कॉलेज में एडमिशन कराओ, क्या वो पूरे सेमेस्टर तुमको सही से पढ़ाता था?
दलाली का हिस्सा मत बनना।।
इंजीनियरिंग करने आये हो तो अपनी इज़्ज़त करना सीखो।।
10 हज़ार के लिए किसी का भविष्य से न खेलना।

जिन अध्यापकों ने जो चाटुकारिता का रास्ता पकड़ा था उसी का नतीजा भोग रहें हैं।

चेयरमैन की निगाह में खुद को चाटुकारिता की सीढ़ी से उठाने के लिए एडमिशन करवांना इसी का हिस्सा था जो आज कोढ़ बन गया।

वाह वाही लूटने और अध्यापन को छोड़ यह छोचे कृत्य आज उन्ही शिक्षकों के लिए कोढ़ हो गया जिसकी बलि छात्रों का भविष्य दे रहा।

 

गन्दा व्यापार कब तक?
एक सही कदम उठाने के बाद फिर उसको वापस ले लेना आखिर क्यों?

मुद्दा इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन से सम्बंध रखता है।


एक बेहतर निर्णय लिया था कि 60 प्रतिशत अंक वाला छात्र ही तकनीकी शिक्षा ले क्योंकि उसकी छमताओं के अनुसार ठीक था यह।

जब एडमिशन मिलें नही तो वे संस्थाये जो सिर्फ शिक्षा को व्यापार बना लिए उन सभी ने दबाव बनाना शुरू कर दिया ।
और निर्णय बदल गए जनाब।।

 

दुनिया केवल उन्हीं लोगों को याद रखती है, जिनके काम खास होते हैं. बाकि लोग भीड़ में खो जाते हैं.

इस जीवन में मिली ज़िन्दगी को आप दो तरीकों से बिता सकतें हैं:

पहला: चर्चा करते हुए कामयाब किरदारों की ,
दूसरा: खुद चर्चा बन जाएं।

           पहला तरीका: चर्चा करते हुए कामयाब किरदारों का

अगर गौर करें तो हम यह आराम से देख पाएंगे की जो आज अपने जीवन में सफल नही हो पाए हैं उसकी सिर्फ दो ही वजह होती हैं एक तो यह कि वो अपनी योग्यता और काबिलियत का आकलन सही से नही कर सके।

खुद का आकलन तुलनात्मक तरीके से न करें:

कभी भी खुद की तुलना किसी दूसरे से करनी ही नहीं चाहिए,क्योंकि ईश्वर ने हर इंसान में अलग काबिलियत,अलग गुण और अलग छमताये दीं है।
अगर खुद की काबिलियत को सही समय पहंचान गए तो आप अपनी पहचान बना लेंगें।

इंसान जब खुद की तुलना दूसरों से करना शुरू कर देता है तो वहीं वो हार की तरफ अपना पहला कदम बढ़ा बैठता हैं।

कहने का आशय यह कि आप कभी यह न कहें कि मुझे उसके जैसा बनना हैं ,कहना यह कि मुझे वो सफर तय करना है जिस सफर को तय करने के लिए ईश्वर ने छमताओं रुपी वाहन दिया है।

ऐसा करने से अगर आप हार भी गए तो आप जनांब उस सफर में हारेंगे जो आपका था।

अगर आप गायकी का शौक़ रखतें है और आवाज़ बुलंद है तो खुद को गायकी के सफर में दौड़ाएं, न कि खुद की तुलना किसी ऐसे खिलाड़ी से करें कि जो आपके सफर का है नहीं।

दूसरा तरीका: खुद चर्चा बन जाएं

 

 

बहाना नही वजह तलाशिये:

हर एक उद्देश्य को पूरा करने में कठिनाइयां आती ही हैं,क्योंकि अगर आसानी से ही हर किसी को मंज़िल मिल जाये तो वो मंज़िल खास नहीं बल्कि आम होगी।

जो हर कार्य में,हर एक प्रणली में बहाना दूँढते हैं वो अपनी मंज़िल तक नही पहुँच सकते।

किसी भी उद्देश्य को पूरा करने में अगर हम अगर सिर्फ कठिनाई या आ रही दिक्कतों पर निगाह रखे रहेंगे तो यकीन मानिए उस उद्देश्य को आप पूरा कर ही सकते।
यहीं अगर यह सोंच कर देखें कि यदि यह मकसद हम पूरा कर लें तो आने वाले समय में हम अपनी स्थिति सुधार सकतें हैं।

उज्ज्वल भविष्य के लिए यह जरूरी है कि आप Past का बोझ अपनी पीठ पर न लादने की आदत डालें 

कहने की मंशा यह कि आज आपका Present यदि Continuous है तो Future Perfect खुद ही हो जायेगा।

तय आपको करना है कि आने वाली अपनी पीढ़ी को मिसाल देनी है या नसीहत।

हम हैं ना ..

हम हैं ना ..

#कहकर लेंगें ।।।


सभी मित्रों और छात्रों से एक मिशन की #चर्चा जल्द करूँगा,

#मिशन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और #बेरोजगारी के निवारण से सम्बंधित है।

शिक्षा और रोज़गार के खोये सामंजस्य को बढ़ावा देंगे।
और बेरोजगारी की चर्चा आप खुद #मंच से करेंगे,देखें कौन रोकेगा।

माने की #कहकर लेंगें।।।

आप सभी के #सहयोग की इच्छा रखता हूँ।
#साथ चाहिए आपका सिस्टम की लेने के लिए।।।।

 

मोहित

मोहित

 इंजीनियरिंग एवं मेडिकल में प्रवेश और फिर से दलाली का धंधा शुरू होने का समय आ गया है।
पुनः इंटर की परीक्षा पास छात्रों के सपने को बेचोगे।
उनको इंजीनियरिंग के सपने दिखाओगे।
जिस छात्र को अपने गांव का नाम अंग्रेज़ी में लिखना न आता हो उसे mnc में खयाली नौकरी का वादा करोगे।
फिर कोई पिता अपने उस पुत्र के लिए अपना खेत बेचेगा जो पुत्र इंजीनियरिंग के लायक ही नही।
स्कॉलरशिप का लालच दोगे लेकिन दलाली करोगे।

आखिर कब तक यह गन्दगी और रहेगी। कब तक विश्व विद्यालय इस पर कोई कार्यवाही नही करेगा।

एक लगाम एक पैरवी होनी चाहिए।

सभी छात्रों से निवेदन है कि बिना खुद की क्षमताओं को पहचाने चका चौंध का शिकार न बने।
आप वो करे जो आपकी क्षमताओं में हो या प्रयास करने पर आप उसे पूरा कर सके।
सपनो के दलालों से सावधान रहें।

mohit, humhainna, hum hain na

mohit, humhainna, hum hain na

और भी तेज़ दौड़ सकता है आपका बच्चा अगर आप उसकी पीठ से उतर जायें ! आज एक छोटा सा और मायने बड़े रखने वाला एक प्रश्न पूछा गया कि: आखिर आज के दौर में छात्रों को अपने जीवन मे सफलता पाने के लिए क्या करना चाहिए ? जवाब: हर छात्र अपने जीवनरूपी दौड़ में और बेहतर दौड़ सकता है यदि अभिवावक दौड़ के दौरान उसकी पीठ से उतर जाएं। मतलब बिल्कुल साफ है कि अभिवावक अगर उस दौड़ को चुनने की आज़ादी का कुछ प्रतिशत अगर अपने बच्चों को दे दें यानि अगर बच्चा यह तय करने के लिए स्वतंत्र रहे कि उसे किस दौड़ में दौड़ना है। अगर बच्चा अपनी छमताओं को जानते हुए खुद की काबिलियत से रूबरू हो जाता है और यह तय कर लेता है कि क्या जिस दौड़ में वो हिस्सा ले रहा है वो सिर्फ शामिल होने मात्र तक ही सीमित है या वो जीतने के लिए उस दौड़ में है। याद रखें गर दौड़ में है तो जीतने के उद्देश्य के साथ उस दौड़ को जीते,हिस्सा बनकर अगर दौड़ में शामिल मात्र से दौड़ नही जीती जाती।। एक ही खिलाड़ी विजेता बनता है,वो खिलाड़ी जीतने के लिए दौड़ता है, दौड़ने के लिए नहीं । अभिवावको को यह ध्यान में रखना चाहिए कि वो अपने बच्चों के लिए खुद ही दौड़ को चिन्हित न करें,बल्कि अपने बच्चों की छमताओं के , काबिलियत के आधार पर उनकी सहमति जानते हुए ही उन्हें जीवन की करियर रूपी दौड़ में शामिल कराएं।